Wednesday, July 30, 2025

दहेज़

किसी बाप ने बोझ समेट 

सिर से आज उतारा 

तो किसीने अपनी लक्ष्मी बाई की ढाल बन 

सुबह ही आने वालों को जाने का रास्ता दिखा डाला 


किसी ने अपना हक़ मांग 

बराबर कन्धा दिया 

तो किसी अबला ने न माँगा न दिया 

बस मांगने वालों की आग में खुद से ख़ुदी को खो डाला 


किस्से हज़ारों नम इन आँखों में 

कुछ नीति से भरे तो कुछ युक्तियुक्त 

कुछ संकुचे कुछ उन्मुक्त 

कुछ जीते ... कुछ जीये 


कहानी हम  सब ने अपनी खुद लिखी 

किसीने कलम खुद पकड़ी 

तो किसीने सब को थमाई 

और यूँ ताना बाना बुन 

समाज की चादर बनायी 


और छेद तो तब बने इस चादर में 

जब एक ताने ने बाने का सिर झुकाया 

न सम्मान दिया न स्वीकारा 

वो हाथ मेरा भी था जितना तेरा 


समाज की ये लड़ाई 

कब निति या नियम जीत पाए हैं 

एक दुसरे को नकार 

कब एक या  करोड़ क्रांति ला पाए हैं 

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