Wednesday, October 3, 2007

इस मोड़ से ...


बन्धन है
अपनी ज़रूरतों का
और कहीँ धुंध मैं हैं
मेरी इछाएँ, मेरे सपने

जो सामने है
वो मेरा नही
और जो मेरा है
वो सामने नही

तो किस मोड़ मुदुं अब
किस राह को करूँ आसां
इक राह जो चली हूँ अब तक
डर है, कहीँ उस मोड़ से छुट ना जाए

पर जब मंज़िल का पता नही
अपने ख्वाबों पर भरोसा नहीं
तो किस मोड़ मुदुं क्या फर्क पड़ता है
हर मोड़ पर तो नए ख्वाबों का ठेला पड़ा है

चलो हमने कुछ ख्वाब खरीद लिए
पर कब तक उनको हम जियेंगे
जब बोझ लगेगा
तो अगले मोड़ पर पड़ी कूड़े की झोली मैं फेक देंगे

और किसी और नए मोड़ से
नए ख्वाब खरीद लेंगे
तो भला क्यों हम इन नए रास्तों को कोसें
जब ख़ुद किसी ख्वाब के हम मालिक नहीं