Friday, May 21, 2021

आज़ादी


आज़ादी रिश्तों को तोड़ कब मिली 

आज़ादी सब छोड़ कब मिली 

आज़ादी तो मन की थी, जैसी मांगी वैसी  मिली 


आज़ादी पढ़ लिख कर कब मिली 

आज़ादी पैसों से इज़्ज़त से कब मिली 

आज़ादी तो हर पल में थी, जब चाही तब मिली 


हाथों में पकड़ यूँ जग बटोरा 

इधर उधर सब सुन यूँ बोझ बिठोरा 

आज़ादी जग बटोरने में कब मिली 

आज़ादी तो हलकी सी थी, बस सांस भर छोड़ा ___और मिली 


पर क्या आज़ादी से में खुश थी?

या पिंजरे में बंद, रिश्तों की ताल में बँध 

सोने की चमक से चुंध्याई, या आन बान से सिकुड़ी 

या फिर __खाली सी, कुछ हलकी सी, और कम सी 

आज़ादी ___

जब चाही तब मिली